चल लौट चलते हैं..! बहुत दूर नहीं आ गए, हम यूँ चलते चलते, चल लौट चलते हैं उस घर की ओर, माँ की आँखें जहाँ अब बूढी हो चली हैं, तेरे इंतजार की इन्तहां में, इतना खो कर क्या ही पाया खुद में सपने बुनते बुनते; अश्क की लकीरे भी अब सुर्ख हैं तेरे अक्स पर, और तुम खुश हो रहे इन झूठी मंज़िलों से मिलते मिलते; बेहतर से बेहतरीन की तरफ बढ़ते कोशिशों से भरे तेरे वो कदम देख कितना दूर ले आये रोते हँसते; चल लौट चलते हैं उस आँगन की ओर, जहाँ बहन की राखी की थाल सज रही तेरे आहट के बढ़ते आवाज़ के यकीं मे, रास्ते ही तो हैं और चल भी लोगे तुम फिर से, रोशनी तो भी साथ है तेरे, पकड़ न, हाथ इनका और वायदा कर की अब न होगी बेपरवाहियाँ, जो अब तक करते रहे सीखते समझते; चल लौट चलते हैं उस गाँव की ओर, जहाँ उन पंक्षियों की शीरी सदा का सुकूँ है, जहाँ पर तुम्हारे फेंके हुए रोटी के टुकड़ों को चुपके से गिलहरियों का ले जाना, और उनकी हर...