कुछ करना चाहता हूँ ज़िंदगी के पायदान पे जो खामोशियों का शोर था, कटते हुए राह-ए-गुज़र मे कमजोरियों का ज़ोर था, उस शांत सागर के विध्वंस को जगाना चाहता हूँ, कुछ करना चाहता हूँ | किसी की भूख का निवाला, किसी की प्यास का मैं प्याला, किसी के घाव का मरहम, टूटती राग का मैं सरगम, अपने देश का मैं परचम, होना चाहता हूँ | माँ, मैं कुछ तो करना चाहता हूँ | वो था जो हमसे छूट गया, पाला था जो सपना टूट गया, उस खेत की सूखी सतह पर खुल कर बरसाना चाहता हूँ, माँ, मैं कुछ करना चाहता हूँ | ...