नाम थी ज़िन्दगी लिखनी थी किताब नाम थी ज़िन्दगी ; थे पन्ने बेहिसाब नाम थी ज़िन्दगी साहस की पैमाइशें मन में न थी , सोच भी तनहा ही थी , विश्वास का भी उन्वान था , चेतक सी कल्पनाओ पर बैठा मैं प्रताप था बचपन का था ख्वाब , नाम थी ज़िन्दगी, लिखनी थी एक किताब नाम थी ज़िन्दगी। तब रुकावटों के ख्याल न थे , चहरे पर सिलवटें से सवाल न थे , अभी अभी बनी हुयी सड़क जैसे रास्तों पर गड्ढों के निशाँ भी न थे ; स्याही से भरी थी दवात, नाम थी ज़िन्दगी, लिखनी थी वो किताब ...
कुछ करना चाहता हूँ ज़िंदगी के पायदान पे जो खामोशियों का शोर था, कटते हुए राह-ए-गुज़र मे कमजोरियों का ज़ोर था, उस शांत सागर के विध्वंस को जगाना चाहता हूँ, कुछ करना चाहता हूँ | किसी की भूख का निवाला, किसी की प्यास का मैं प्याला, किसी के घाव का मरहम, टूटती राग का मैं सरगम, अपने देश का मैं परचम, होना चाहता हूँ | माँ, मैं कुछ तो करना चाहता हूँ | वो था जो हमसे छूट गया, पाला था जो सपना टूट गया, उस खेत की सूखी सतह पर खुल कर बरसाना चाहता हूँ, माँ, मैं कुछ करना चाहता हूँ | ...