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नाम थी ज़िन्दगी- "Book of Life"

  नाम   थी ज़िन्दगी   लिखनी   थी   किताब   नाम   थी ज़िन्दगी ; थे   पन्ने   बेहिसाब   नाम   थी  ज़िन्दगी साहस   की   पैमाइशें   मन   में   न   थी , सोच   भी   तनहा   ही   थी ,  विश्वास   का   भी   उन्वान   था , चेतक   सी   कल्पनाओ   पर   बैठा   मैं   प्रताप   था बचपन   का   था   ख्वाब ,  नाम   थी  ज़िन्दगी, लिखनी   थी   एक   किताब   नाम   थी  ज़िन्दगी।   तब   रुकावटों   के   ख्याल   न   थे , चहरे   पर   सिलवटें   से   सवाल   न   थे , अभी   अभी   बनी   हुयी   सड़क   जैसे रास्तों   पर   गड्ढों   के   निशाँ   भी   न   थे ; स्याही   से   भरी   थी   दवात,   नाम   थी   ज़िन्दगी, लिखनी   थी   वो   किताब ...
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कुछ करना चाहता हूँ! - An Incomplete Desire.

कुछ करना चाहता हूँ   ज़िंदगी के पायदान पे जो खामोशियों का शोर था, कटते हुए राह-ए-गुज़र मे  कमजोरियों का ज़ोर था, उस शांत सागर के विध्वंस  को जगाना चाहता हूँ,     कुछ करना चाहता हूँ | किसी की भूख का निवाला,  किसी की प्यास का मैं प्याला,  किसी के घाव का मरहम,  टूटती राग का मैं सरगम,  अपने देश का मैं परचम,  होना चाहता हूँ | माँ, मैं कुछ तो करना चाहता हूँ | वो था जो हमसे छूट गया,  पाला था जो सपना टूट गया,  उस खेत की सूखी सतह पर  खुल कर बरसाना चाहता हूँ,   माँ, मैं कुछ करना चाहता हूँ |                                                                                                                ...

चल लौट चलते हैं ...! (Let's go back)

चल लौट चलते हैं..! बहुत दूर नहीं आ गए, हम यूँ  चलते चलते, चल लौट चलते हैं उस घर की ओर, माँ की आँखें जहाँ अब बूढी हो चली हैं, तेरे इंतजार  की इन्तहां में, इतना खो कर क्या ही पाया खुद में सपने बुनते बुनते; अश्क की लकीरे भी अब सुर्ख हैं तेरे अक्स पर, और तुम खुश हो रहे इन झूठी मंज़िलों से मिलते मिलते; बेहतर से बेहतरीन की तरफ बढ़ते कोशिशों से भरे तेरे वो कदम  देख कितना दूर ले आये रोते हँसते; चल लौट चलते हैं उस आँगन की ओर, जहाँ बहन की राखी की  थाल सज रही  तेरे आहट के बढ़ते आवाज़ के यकीं मे,  रास्ते ही तो हैं और चल भी लोगे तुम फिर से,  रोशनी तो भी साथ है तेरे,  पकड़ न, हाथ इनका और वायदा कर  की अब न होगी बेपरवाहियाँ,  जो अब तक करते  रहे सीखते समझते;         चल लौट चलते हैं उस गाँव की ओर, जहाँ उन पंक्षियों की शीरी सदा का सुकूँ  है, जहाँ पर तुम्हारे फेंके हुए रोटी के टुकड़ों  को चुपके से गिलहरियों का ले जाना, और उनकी हर...

शुरुआत- The Beginning

शुरुआत  बीत रही थी वह एक लम्बी काली रात, गुम जो हुयी वह थी सपनो की सौगात, तलाश खुद की घूम कर हुयी अब फनाह, पर खोज तो खत्म कभी होती नहीं, रंग भरे ऑरोरा  दिखा रहे रास्ते वहीं, देख तो सही क्षितिज के उस पार, मंजिलों की मजलिस हैं बाहें फैलाये, उनकी चाहतें हैं  हिफाज़त में,  तेरे लिए बनी हैं वो सहर की पासबाँ, बेबसी से भरी है तेरे अक्स की दरकार, उज़्र से बेख़बर बढ़ रहे क़ुर्ब, एक नूर है रही तुम्हें पुकार, उस ज़िबे सहर के वक्त  में,  शुरू तो कर अपने कदम उस रौशन, आफ़ताब की तरफ.....!                                                                                                           - Panka...

दिल कर रहा कि तेरी कोई "बात" लिख दूँ! "About You..!"

दिल कर रहा कि तेरी कोई " बात  " लिख दूँ    दिल कर रहा कि तेरी कोई   बात लिख दूँ,   दूर तो काफी रहे हैं, तू कहे तो  तेरा वो साथ   लिख दूँ; अंजाम का पता तो नहीं, इस कलम से वो आगाज  लिख दूँ; सफर-ए-ज़िन्दगी कट रही थी ऐसे, कैसे मिला तू वो इत्तेफाक  लिख दूँ; कहने को इतना है की क्या क्या कहें, इजाज़त हो तो बिख़रे अलफाज़ लिख दूँ; मोहब्बत की कसक हमेशा से थी,जो कह न सके वो छलकता जज़्बात  लिख दूँ; ऊंचाईंयाँ चूमने को भटकते रहे हम इस क़दर, कहो तो जेहन में पनपता वो  उन्माद लिख दूँ; उन शिखरों की ओर साथ बहुत चले  तो मगर, यादों में जो बसा है वो उतरता ढलान लिख दूँ; दिल की बात भी करते हैं हम, असल कहे तू तो धड़कन की आवाज़ लिख दूँ; एक चित मन हमेशा से रहा अपना, तेरी वजह से होता रहा वो भटकाव लिख दूँ; दिल कर रहा कि तेरी कोई बात    लिख दूँ |   -Pankaj Singh "Sahitya"

और लहू बहता रहा - A short view of Jaliyawalabaag

                     और लहू बहता रहा                                   -A short view of Jaliyawalabaag. न जाने कौन सी घडी थी वो , उस समय से थे अंजान हम सभी , दुआ भी न मांगू   की ऐसा हो सपने में भी अन्य दिखे वैसा कभी सारा समां ख़ामोशियों की आग़ोश में था, कोई न था बोलने वाला और न कोई था   सुनने वाला , लहू बिखरा पड़ा था ज़मीन पर , काग़ज़ के टुकड़े कफ़न बने थे धरती तो क्या , आसमाँ भी नज़र न डाल पाया ऐसे मंज़र पर ! देखते अगर कोई तो उसकी रूह काँप जाती देख लेता अगर उस मंज़र को कोई , तो खुशियाँ हमेशा के लिए उसे छोड़ देती कैसा था वो . ..........? थम सा गया था आसमान बदल फिर भी चल रहे थे आकृति उनकी बड़ी अज़ीब थीं ऐसा लग रहा था कुछ कह रहें हों। हर दिशा में एक ही रंगोली सजी थी जिस तरफ   द...

एक स्वप्न- A Dream

                                        एक   स्वप्न  - A Dream I was on journey to Kashmir with my friends Rohit, Pankaj and Shirish.  I have  seen something in my dream and suddenly woken up with a strange feeling that made me stunned, what was going on? I really didn't get.  After that I was unable to sleep and then decided to write the conversation between a girl and a boy in my own poetic form.   एक दौर गुजर गया आपस में बिछड़ने के बाद ,  पर यादें अटल हैं . मिलना और जुदा होना नियति के हाथ में रहा , इसलिए दोष किसी को दे नहीं सकते , पर सुनहरी यादों को सहेज कर रख सकते हैं .   एहसास बूढ़े कहाँ होते हैं कभी , वो तो थमें हुए हैं इंतज़ार में .. अब एक पल का इंतज़ार है ताकि आमने   सामने होकर उस सुनहरे क्षण को तराशते हुए यह कह सकें कि इस...