दिल कर रहा कि तेरी कोई "बात " लिख दूँ
दिल कर रहा कि तेरी कोई बात लिख दूँ,
दूर तो काफी रहे हैं, तू कहे तो तेरा वो साथ लिख दूँ;
अंजाम का पता तो नहीं, इस कलम से वो आगाज लिख दूँ;
सफर-ए-ज़िन्दगी कट रही थी ऐसे, कैसे मिला तू वो इत्तेफाक लिख दूँ;
कहने को इतना है की क्या क्या कहें, इजाज़त हो तो बिख़रे अलफाज़ लिख दूँ;
मोहब्बत की कसक हमेशा से थी,जो कह न सके वो छलकता जज़्बात लिख दूँ;
ऊंचाईंयाँ चूमने को भटकते रहे हम इस क़दर, कहो तो जेहन में पनपता वो उन्माद लिख दूँ;
उन शिखरों की ओर साथ बहुत चले तो मगर, यादों में जो बसा है वो उतरता ढलान लिख दूँ;
दिल की बात भी करते हैं हम, असल कहे तू तो धड़कन की आवाज़ लिख दूँ;
एक चित मन हमेशा से रहा अपना, तेरी वजह से होता रहा वो भटकाव लिख दूँ;
दिल कर रहा कि तेरी कोई बात लिख दूँ |
-Pankaj Singh "Sahitya"
-Pankaj Singh "Sahitya"
