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नाम थी ज़िन्दगी- "Book of Life"

 

नाम थी ज़िन्दगी

 

लिखनी थी किताब नाम थी ज़िन्दगी;

थे पन्ने बेहिसाब नाम थी ज़िन्दगी

साहस की पैमाइशें मन में  थी,

सोच भी तनहा ही थी

विश्वास का भी उन्वान था,

चेतक सी कल्पनाओ पर बैठा मैं प्रताप था

बचपन का था ख्वाबनाम थी ज़िन्दगी,

लिखनी थी एक किताब नाम थी ज़िन्दगी।

 


तब रुकावटों के ख्याल  थे,

चहरे पर सिलवटें से सवाल  थे,

अभी अभी बनी हुयी सड़क जैसे

रास्तों पर गड्ढों के निशाँ भी  थे;

स्याही से भरी थी दवात, नाम थी ज़िन्दगी,

लिखनी थी वो किताब नाम थी ज़िन्दगी।

 


 लग रहा अभी की  बात थी,

रिहायसी चमक से भरी वह रात थी,

पूछ रहा खुद  कैसी कसम है,

टूट गयी फिसल कर हाथ से वह कलम है,

कहाँ और कैसे हुए फना तेरे जज्बात,

अब भी पूछती मुझसे है जवाबनाम है ज़िन्दगी,

मुझे लिखनी थी किताब नाम  थी ज़िन्दगी।

 

                                                                                                -पंकज सिंह "साहित्य " 

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