एक स्वप्न -A Dream
I was on journey to Kashmir with my friends Rohit,
Pankaj and Shirish. I have seen something in my dream and suddenly woken up with a strange feeling that made me stunned, what was going on? I really didn't get. After that I was unable to sleep and then decided to write the conversation
between a girl and a boy in my own poetic form.
एक दौर गुजर गया आपस में बिछड़ने के बाद, पर यादें अटल हैं. मिलना और जुदा होना नियति के हाथ में रहा, इसलिए दोष किसी को दे नहीं सकते, पर सुनहरी यादों को सहेज कर रख सकते हैं. एहसास बूढ़े कहाँ होते हैं कभी, वो तो थमें हुए हैं इंतज़ार में .. अब एक पल का इंतज़ार है ताकि आमने सामने होकर उस सुनहरे क्षण को तराशते हुए यह कह सकें कि इस परिवर्तन में उस वक़्त सा कुछ न रहा .. एक बार स्वप्न में तुम मिली और मैंने कहा था ," यह दुनिया कितनी बदल गयी है न ?" उत्तर में तुम कह उठी , "बिलकुल सच " और मैं बोल बैठा "अब तो हम भी हम नहीं रहे .."
ऐसा क्या और क्यूँ हुआ हमारे बीच !
After some time the boy having tears in his eyes and telling
something to her...
तेरा ही रूप रंग, तेरा ही मैं अंग
क्यूँ नहीं चाहती, मुझे तू अपने संग?
तेरा अभिमान मैं, तेरा स्वाभिमान मैं
बनूँगा एक दिन तेरे दिल का मेहमान मैं
फिर क्यूँ तेरे दामन की छाँव से वंचित हूँ मैं
न चाहूँ कुछ, दे जगह मुझे अपने जीवन मे तू
बसता भी हूँ तेरे मन में, फिर क्यूँ है यह अनमनापन
क्यूँ नहीं चाहती, मुझे तू अपने संग?
अगर,
अगर, तू श्वेत है तो मैं भी श्याम नहीं,
तू कोमल है तो मैं भी कठोर नहीं,
तुझे मान है तो मुझे भी अभिमान नहीं,
अगर, यह तेरा फ़र्ज़ है तो मैं भी खुदगर्ज नहीं |
कभी ऐसा हुआ अगर
मिलेंगे हम स्वप्न लोक में
फिर एक बार पूछना चाहूँगा मैं
कि,
तेरा ही रूप रंग, तेरा ही मैं अंग
क्यूँ नहीं चाहती, मुझे तू अपने संग....???
-Pankaj Singh "Sahitya"
19/04/2010