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और लहू बहता रहा - A short view of Jaliyawalabaag


                     और लहू बहता रहा  
                               -A short view of Jaliyawalabaag.

जाने कौन सी घडी थी वो,
उस समय से थे अंजान हम सभी,
दुआ भी मांगू  की ऐसा हो
सपने में भी अन्य दिखे वैसा कभी
सारा समां ख़ामोशियों की आग़ोश में था,

कोई था बोलने वाला
और कोई था सुनने वाला,
लहू बिखरा पड़ा था ज़मीन पर,
काग़ज़ के टुकड़े कफ़न बने थे
धरती तो क्या, आसमाँ भी नज़र
डाल पाया ऐसे मंज़र पर !

देखते अगर कोई तो उसकी रूह काँप जाती
देख लेता अगर उस मंज़र को कोई,
तो खुशियाँ हमेशा के लिए उसे छोड़ देती

कैसा था वो. ..........?


थम सा गया था आसमान
बदल फिर भी चल रहे थे
आकृति उनकी बड़ी अज़ीब थीं
ऐसा लग रहा था कुछ कह रहें हों।

हर दिशा में एक ही रंगोली सजी थी
जिस तरफ देखो
हर तरफ अलग आकृतियाँ
जीवन और मृत्यु एक साथ झूल रहा
किसी ने देखा समझा
बस ..................................

 लहू बहता रहा , बस लहू बहता रहा.......


                                                                                         




   

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