कुछ करना चाहता हूँ
ज़िंदगी के पायदान पे
जो खामोशियों का शोर था,
कटते हुए राह-ए-गुज़र मे
कमजोरियों का ज़ोर था,
उस शांत सागर के विध्वंस
को जगाना चाहता हूँ,
कुछ करना चाहता हूँ |
किसी की भूख का निवाला,
किसी की प्यास का मैं प्याला,
किसी के घाव का मरहम,
टूटती राग का मैं सरगम,
अपने देश का मैं परचम,
होना चाहता हूँ |
माँ, मैं कुछ तो करना चाहता हूँ |
वो था जो हमसे छूट गया,
पाला था जो सपना टूट गया,
उस खेत की सूखी सतह पर
खुल कर बरसाना चाहता हूँ,
माँ, मैं कुछ करना चाहता हूँ |
-Pankaj Singh "Sahitya"
